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इतिहास

नवगठित जिला गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही में पेंडरा जमींदारी का क्षेत्रफल 774 वर्गमील था एवं इसके अंतर्गत 225 ग्राम थे । रत्नपुर के कलचुरि नरेश के आश्रय में हिन्दूसिंह और छिन्दूसिंह नामक दो भाई रहते थे। इन्होंने रास्ते के किनारे एक बोरा भर द्रव्य पडे़ पाया जिसे वे राजा को दे आए। राजा ने उसकी इस इमानदारी से प्रसन्न होकर इन्हें पेण्डरा जमींदारी ईनाम में दी । यह जमींदारी इनके घराने में 12 पुश्तों से चली आयी थी । पंडरीवन अर्थात् पेंडरा से हिन्दूसिंह के वंश की बड़ी उन्नति हुई । 80 और 100 वर्ष के भीतर इसके वंशज केन्दा, उपरोडा, मातिन के अधिकारी बन बैठे । मराठों के शासन काल में भी ये अपनी जमींदारियों का उपभोग सन् 1798 तक करते रहें । सन् 1818 में जब कर्नल एगन्यू छत्तीसगढ़ का सुपरेन्डेंटेंड होकर आये तक उसने पुराने अधिकारी के वंशज अजीत सिह को जमींदारीं सौंप दी । मराठा काल में पेंडरा गढ़ पिंढारियों का महत्वपूर्ण केन्द्र था । इस क्षेत्र में पिण्डारे डाकू होते थे, जो रतनपुर और जबलपुर तक आक्रमण किया करते थे । इन्हीं के कारण इस क्षेत्र को पिण्डारा कहा जाता था जो वर्तमान में पेण्ड्रा हो गया।

छत्तीसगढ़ का प्रथम समाचार पत्र छत्तीसगढ़ मित्र का प्रकाशन मासिक पत्रिका के रूप में पेण्ड्रा से वर्ष 1900 में पण्डित माधवराव सप्रे के सम्पादन में किया गया । जिला गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही चावल की गुणवत्ता, आदिवासी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि जैसी अनूठी विशेषताओं के कारण न केवल छत्तीसगढ़ राज्य में प्रसिद्ध है बल्कि सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध है।